दहेज उत्पीड़न मामलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- बिना ठोस सबूत ससुराल वालों पर मुकदमा नहीं

Supreme Court Takes Strict Stance on Dowry Harassment Cases: No Prosecution of In-laws Without Concrete Evidence
  • रिपोर्ट: स्निग्धा श्रीवास्तव

नई दिल्ली: Supreme Court of India ने घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न से जुड़े मामलों में एक अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल आरोपों और सामान्य दावों के आधार पर पति के रिश्तेदारों के खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ससुराल पक्ष को आरोपी बनाने के लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत होना जरूरी है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने इसी के साथ ससुराल वालों के खिलाफ दर्ज दहेज उत्पीड़न और आईपीसी की धारा 498ए के मामले को रद्द कर दिया।

यह मामला गुना से जुड़ा है, जहां एक महिला ने जनवरी 2023 में अपने पति और ससुराल वालों पर क्रूरता, घरेलू हिंसा और दहेज मांगने का आरोप लगाया था। महिला की शादी नवंबर 2019 में हुई थी। शिकायत में कहा गया था कि शादी के दौरान नकद, गहने और घरेलू सामान देने के बावजूद अतिरिक्त दहेज की मांग की गई और उसे प्रताड़ित किया गया। इसके बाद महिला ने आईपीसी की धारा 498ए, धारा 34 और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज कराया था।

महिला ने ससुराल पक्ष पर मानसिक उत्पीड़न, कैमरों से निगरानी रखने, आने-जाने पर रोक लगाने और लाइसेंसी बंदूक से धमकाने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए थे। मामला जब Madhya Pradesh High Court की ग्वालियर बेंच पहुंचा तो हाईकोर्ट ने एफआईआर और कानूनी कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद ससुराल पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए कहा कि वैवाहिक संबंध खराब होने पर अक्सर पूरे परिवार को विवाद में घसीट लिया जाता है। अदालत ने कहा कि केवल पति का समर्थन करना या समझौते की सलाह देना किसी रिश्तेदार को अपराधी नहीं बना देता।

शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों को भी निर्देश दिया कि ऐसे मामलों में सावधानी बरती जाए और बिना ठोस सबूतों के रिश्तेदारों को कानूनी प्रक्रिया में न घसीटा जाए। कोर्ट ने कहा कि कानून का इस्तेमाल किसी हथियार की तरह नहीं किया जा सकता।

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